Saturday, April 25, 2020

एमआईटी एक्सपट्र्स ने बनाए ऐसे धुले जा सकने वाले सेंसर जिन्हे कपड़ों में लगाया जा सकेगा

मैसाच्यूसेट्स इंसटीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) के विशेषज्ञों ने एक नया कोविड-19 सेंसर विकसित किया है जो वाटरप्रूफ है और इसे आसानी से कपड़ों में लगाया जा सकता है। टेकक्रंच की नई रिपोर्ट के अनुसार एमआइटी ने एक नए प्रकार का लाइटवेट सेंसर विकसित किया है जो हल्का और इतना पतला है कि इसे कपड़े के भीतर लगाया जा सकता है। इसमें विभिन्न प्रकार के पॉलिएस्टर शामिल हैं जो आमतौर पर एथलेटिक्स पहनने में उपयोग किए जाते हैं। इन सेंसर्स को धोया जा सकता है।

एमआईटी एक्सपट्र्स ने बनाए ऐसे धुले जा सकने वाले सेंसर जिन्हे कपड़ों में लगाया जा सकेगा

ये नए सेंसर पहनने वाले के महत्वपूर्ण संकेतों की निगरानी कर सकते हैं जिसमें उसकी श्वसन दर, हृदय गति और शरीर का तापमान शामिल है। सेंसर्स का उपयोग न होने पर इन्हें आसानी से हटाकर दूसरे परिधान में भी रखा जा सकता है। इसे स्मार्टफोन से भी जोड़ा जा सकता है। इस डिजायन का लक्ष्य अंतत: चीन में भागीदारों के साथ मिलकर सेंसर का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना है। प्रोटोटाइप में खेल उद्योग, स्वास्थ्य उद्योग और यहां तक कि अंतरिक्ष मिशन के दौरान किसी अंतरिक्ष यात्री के महत्वपूर्ण संकेतों की निगरानी के लिए किया जा सकता है।

एमआईटी एक्सपट्र्स ने बनाए ऐसे धुले जा सकने वाले सेंसर जिन्हे कपड़ों में लगाया जा सकेगा

कोविड-19 के कारण चल रहे महामारी के दौरान सेंसर का अन्य उपयोग भी है। इस महामारी के नियंत्रण में आने पर भी प्रोटोटाइप से स्वास्थ्य सुविधाओं को लाभ होगा। इस संवेदक का उपयोग उन रोगियों के साथ किया जा सकता है जिनकी चिकित्सकों की निगरानी में नियमित जांच और निगरानी की आवश्यकता होती है। इससे टेलीमेडिसिन के माध्यम से लोगों के बायोमेट्रिक डेटा की निगरानी भी की जा सकेगी।

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Thursday, April 23, 2020

हग रिएक्शन फीचर ऐड कर फेसबुक जतायेगा आपकी सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता

अब दिग्गज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को ही ले लीजिए। लाइक बटन और लोगों की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देने के अन्य फीचर के साथ ही वह कोरोना वायरस को ध्यान में रखकर एक नया फीचर भी जोडऩे जा रहा है। कंपनी अपने यूजर को कितना सम्मान देती है और उनकी सेहत के लिए कितनी चिंतित है इसे प्रदर्शित करने के लिए फेसबुक जल्द ही एक एनिमेटेड इमोजी जोडऩे जा रहा है जिसमें वह एक दिल को गले लगा रहा है। इसका मतलब है कि कंपनी को कोरोनावायरस महामारी के दौरान आपकी फिक्र है और अब आप भी अपने परिजनों, दोस्तों औरपरिवारों को ये इमोजी भेजकर अपनी चिंता प्रदशित कर सकते हैं। यह इमोजी दिखात है कि आप पोस्ट पर मिलने वाले लाइक्ससे ज्यादा उक्त व्यक्ति की चिंता करते हैं। मजे की बात यह है कि फेसबुक अपने मैंसेंजर ऐप पर इसका इस्तेमाल नहीं कर रहा है। इस नई एनिमेटेड इमोजी को अपडेट करने के लिए आप दिल की प्रतिक्रिया को दबा सकते हैं। इसे वापस बदलने के लिए नए रिएक्शन को फिर से दबाकर रखें।

हग रिएक्शन फीचर ऐड कर फेसबुक जतायेगा आपकी सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता

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8 हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों का नेतृत्व संभालते हैं डीआरडीओ के चेयरमैन रेड्डी

इस समय वे अपने 8 हजार वैज्ञानिकों की टीम के साथ देश में पीपीई की किट की कमी को पूरा करने के लिए हैंड सैनिटाइजऱ और वेंटिलेटर, सस्ते चिकित्सकीय उपकरण बना रहे हैं। रेड्डी ने बताया कि वे अब तक 30 हजार से ज्यादा सैनिटाइजर की बोतलें दिल्ली पुलिस, सशस्त्र बलों और अन्य सरकारी एजेंसियों एवं फ्रंटलाइन चिकित्सकों-नर्सिंगकॢमयों वितरित कर चुके हैं। अब हम प्रतिदिन 10 हजार लीटर हैंड सैनिटाइजऱ का उत्पादन करने में सक्षम हैं। जब भारत में मामलों की संख्या 30 के पार हो गई तब डीआरडीओ ने कोरोना का मुकाबला करने के लिए उत्पादों पर काम करना शुरू कर दिया। पीपीई जैसे अत्यावश्यक उपकरण हमारे रक्षा वैज्ञानिक बना रहे हैं। हम उपकरणों को ससता और पोर्टेबल बना रहे हैं क्योंकि स्वास्थ्य देखभाल वस्तुओं की मांग बहुत बड़ी है और सप्लाई बहुत कम।

8 हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों का नेतृत्व संभालते हैं डीआरडीओ के चेयरमैन रेड्डी

डॉ. सतीश ने बताया कि देशभर में मौजूद डीआरडीओ के प्रत्येक वैज्ञानिक और प्रयोगशाला में काम कर रहे करीब 8 हजार रक्षा वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मचारी दिन-रात वायरस से मुकाबला करने में जुटे हुए हैं जो 15 डीआरडीओ प्रयोगशालाओं में काम कर रहे हैं। अभी तक डीआरडीओ के वैज्ञानिक फ्रंटलाइन चिकित्सकों-नर्सिंगकर्मचारी के लिए 3डी प्रिंटिंग की मदद से फेस शील्ड, सबमरीन में इस्तेमाल होने वाले सूट से बायो सूट बनाया है जिसका अभी 7 हजार प्रतिदिन उत्पादन है जो जरुरत के अनुसार 15 हजार तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे ही मारूत नाम का ड्रोन बनाया है जो ब्लड सेंपल एकत्र कर ला सकता है और जरूरी सामानों की डिलीवरी कर सकता है। इसके अलावा वेंटिलेटर और फुल बॉडी डिस्इनफेक्शन चैम्बर बनाया है। डीआरडीओ सहयोगी कंपनियों के साथ अभी चार दिन में एक डिस्इनफेक्शन चैम्बर का उत्पादन कर रही है।

8 हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों का नेतृत्व संभालते हैं डीआरडीओ के चेयरमैन रेड्डी

इसके अलावा डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने जैफी मेड नाम का रोबोट भी बनाया है जो अतिसंवेदनशील इलाकों, हॉटस्पॉट और आइसोलेशन वार्ड में फ्रंटलाइन चिकित्सकों-नर्सिंगकर्मचारी को रोगी से होने वाले कोरोना केसंक्रमण से बचाएगा। इसे आसानी से रिमोट के जरिए संचालित कर सकते हैं और अपने वजन जितना भार आसानी से उठा सकता है। अहमदनगर स्थित डीआरडीओ की एक प्रयोगशाला ने पूरे शरीर को संक्रमण मुक्त करने वाले इस चैंबर को डिडजाइन किया है जिसे पसर्नल सैनिटाइजेशन एन्क्लोजर कहते हैं। यह चैंबर एक समय में एक व्यक्ति को संक्रेमणरिहत करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है। इस चैंबर में प्रवेश करने के बाद पैर से एक पैडल को चलाने से शरीर की सफाई शुरू हो जाती है। चैंबर में प्रवेश करने के 25 सेकंड में ही वायरस से मुक््रत हो जाते हैं। इसमें 700 लीटर सैनिटाइजर संग्रह किया जा सकता है जिससे लगभग 650 कमर्चारी संक्रमण free हो सकते हैं।

8 हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों का नेतृत्व संभालते हैं डीआरडीओ के चेयरमैन रेड्डी

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Wednesday, April 22, 2020

भारत सरकार के आरोग्य सेतु ऐप के पीछे इनका तकनीकी दिमाग है

खुद को 'वन हिट वंडर' कहने वाले ललितेश ने गूगल के साथ 12 साल काम किया है। इस दौरान वे गूगल की कोर टीम केसदस्य के रूप में गूगल इंडिया, गूगल इंडिया मैप और गूगल मैप मेकर जैसे महत्त्वकांक्षी प्रोजेक्ट से जुड़ रहे। उनका कहना है कि गूगल मैप मेकर एकमात्र ऐसा उत्पाद है जिसे मैंने बड़े पैमाने पर बनाया है। वे मैप के अलावा स्पेस मिशन के लिए रोबोट भी बनाए हैं। वे गूगल के सह-संस्थापकों लैरी पेज और सेर्गेई ब्रिन और गूगल के सीईओ एरिक श्मिट एवं अपने अंतिम प्रोजेक्ट एंड्रॉइड किटकैट पर सुंदर पिचाई के साथ काम कर चुके हैं। आइआइटी बॉम्बे से इंजीनियरिंग करने वाले ललितेश ही कोरोना वायरस के सबसे सफल भारतीय ऐप आरोग्य सेतु के निर्माता हैं।

डिजिटल इम्यूनिटी देगा ऐप
सरकार की सलाहकार समिति के सदस्य और गूगल इंडिया के संस्थापक ललितेश का कहना है कि आरोग्य सेतु ऐप कोविड-19 वैक्सीन के आपने तक हमें डिजिटल प्रतिरक्षा बनाने में मदद करेगा। यह ऐप अन्य उपयोगकर्ताओं का डेटा रिकॉर्ड करता है और इसका विश्लेषण कर य्रह पता लगाया जा सकता है कि आप बीते दिनों संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में तो नहीं थे। सरकार हॉटस्पॉट और सीओवीआईडी-19 रोगी के संपर्क में आए लोगों का पता लगाने के लिए ऐप के DATA से प्राप्त सूचना का उपयोग कर सकती है। ललितेश ने बताया कि लोगों को इस बात का डर सता रहा है कि इस ऐप से उनकी गोपनीयता को खतरा हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, व्यक्तिगत डेटा केवल आपके फोन नेटवर्क पर ही रहता है और इसका उपयोग सरकार द्वारा केवल तभी किया जाता है जब उन्हें वायरस के संक्रमण का जोखिम लगेगा। सरकार को इस ऐप पर भरोसा है।

भारत सरकार के आरोग्य सेतु ऐप के पीछे इनका तकनीकी दिमाग है

उनका कहना है कि यह एप्लिकेशन आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था को अनलॉक करने में भी मदद कर सकती है। ललितेश का कहना है कि इस ऐप का लाभ तभी मिल सकेगा जब बड़े पैमाने पर इसे डाउनलोड किया जाएगा। आरोग्य सेतु एक डिजिटल इनोक्यूलेशन की तरह है जो परिस्थितियों के बिगडऩे पर आपकी मदद करेगा। ललितेश के मुताबिक 8 करोड़ लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमारी आय 90 फीसदी हिस्सा हैं। अगर ये 8 करोड़ (80 मिलियन) लोग एक साथ इस ऐप के प्लेटफॉर्म पर आ जाते हैं तो हमारे पास लगभग 30 करोड़ (300 मिलियन)लोगों का एक नियंत्रण क्षेत्र (कन्टेनमेंट ज़ोन) हो सकता है। यह उस समय तक अर्थव्यवस्था को अनलॉक करने के लिए एक उपकरण के रूप में काम करेगा जब तक हमारे पास वायरस का कोई कारगर इलाज नहीं आ जाता।



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Sunday, April 19, 2020

फूड डिलीवरी ऐप्स भी बहुत कुछ बताते हैं कोरोना वायरस के बारे में

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौरान दुनिया से जुड़े रहने के लिए मोबाइलसे बेहतर कोई साथी नहीं है। ऐसे में मोबाइल ऐप्स और उनके उपयोग का महत्त्व और बढ जाता है क्योंकि आज कोरोना और देश-दुनिया से जुड़ी हर छोटी-बड़ी खबर की जानकारी के लिए हमारी निर्भरता आज किराने के सामान से लेकर मनोरंजन तक पहले से कहीं ज्यादा ऐप पर निर्भर करती है। ऐसे में ऐप डवलपर कंपनियां भी नजर गड़ाए हुए हैं कि कोरोना के इस दौर में उद्योग जगत इस महामारी किस तरह देख रहे हैं, प्रमुख उद्योगपति उस पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं, कहां अवसर पैदा हो रहे हैं और कहां रास्ते बंद हो रहे हैं। हमाने भी ऐसे में एशिया भर में कुछ प्रमुख मोबाइल ऐप देखे और यह पता लगाने की कोशिश की कि कंपनियां क्या कर रही हैं, क्यों कर रही हैं और इससे हमें क्या पता लगता है।

फूड डिलीवरी ऐप्स भी बहुत कुछ बताते हैं कोरोना वायरस के बारे में

मोबाइल ऐप्स का विश्लेषण कर हम एशिया में कोविड-19 महामारी का एक खाका प्रस्तुत करती हैं। मोबााइल पर ऊपर से नीचे की ओर खबर पढ़ी जाती है और इसमें स्क्रीन भी छोटी होती है। मोबाइल में हम दांए से बांए नहीं जाते, वहीं उपयोगकर्ता मोबाइल पर टच करके उसे चलाता है, इसलिए बहुत सारे ऐप के निचले भाग में नेविगेशन होता है न कि शीर्ष पर क्योंकि यह स्विच करने और प्रयोग के लिहाज से भी आसान है। भारत की दो प्रमुख होम डिलीवरी ऐप में प्रतिद्वंद्वी होने के बावजूद जबरदस्त समानताएं हैं। दोनों में ही नेविगेशन सबसे नीचे है और शीर्ष पर उत्पादों के साथ शुरू में प्राथमिकता के साथ कंपनियों ने अपने ऐप पर मिलने वाले उत्पाद उसकेबाद सेवाओं के बारे में और फिर पुन: फीडबैक के रूप में उत्पादों का जिक्र किया हुआ है। कोरोना ने बहुत सी चीजें बदलकर रख दी हैं। इसलिए अपने ग्राहकों को उत्पाद और सेवा के अलावा दो अन्य बातों पर भी निर्णय लेना था।

फूड डिलीवरी ऐप्स भी बहुत कुछ बताते हैं कोरोना वायरस के बारे में

पहला उत्पाद यानी आप क्या बेच रहे हैं दूसरा सर्विय या सेवा यानी आप इसे कैसे बेच रहे हैं। यानि दोनों ऐप्स एक जोखिम पार्टनर की तरह आपके घर तक आपको सेवाएं दे रहे थे आपको बिना संक्रमण के खतरे में डाले हुए। दोनों के लिए यह दिखाना महत्वपूर्ण था कि वे उपयोग करने के लिहाज से कितने सुरक्षित थे। उनकी एप्लिकेशन की होम स्क्रीन उसी का प्रतिबिंब है। दोनों ने सबसे ऊपर सुरक्षा उपायों के बारे में सबसे ऊपर जानकारी दी है। अन्य देशों में फूड डिलीवरी ऐप क्या कर रहे हैं?
सिंगापुर में एक विदेशी फूड डिलीवरी ऐप सेवा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी है। ऐसे ही एक अन्य फूड डिलीवरी ऐप ने अपनी ऐप के होमस्क्रीन पर सबसे पहले कोविड-19 वायरस के बारे में सुरक्षा, उसके बाद सेवा और फिर अपने उत्पाद पर ध्यान केंद्रित किया है। साथ ही नीचे एक भावनात्मक संदेश भी लिखा है कि घर के अंदर ही रहें हम आपकी सेवा में हर खतरे कोपार कर पहुंचेंगे। ऐसा क्यों हो रहा है इसे समझने के लिए हमें सिंगापुर जैसे इन देशों में डिलीवरी ऐप और वहां की सरकार की लॉकडाउन एवं कोरोना वायरस को लेकर नजरिए को समझने की जरुरत है।

फूड डिलीवरी ऐप्स भी बहुत कुछ बताते हैं कोरोना वायरस के बारे में

दरअसल, सिंगापुर के अधिकारी महामारी की शुरुआत से ही देश के बाहर से आने वाले सभी यात्रियों की स्क्रीनिंग कर रहे हैं। उनका कॉन्टैक्ट ट्रेािसंग सराहनीय रहा है। जब भी वे किसी व्यक्ति में संक्रमण की पहचान करते हैं तो केवल दो घंटे में इसकी उत्पत्ति की जह को खोज निकालते हैं। वे ऑनलाइन पोस्ट कर उन स्थानों से जानकारी जुटाते हैं जहां संक्रमित लोग काम करते, रहते समय बिताते हैं ताकि संभावित संपर्कों को पहचाना जा सके। इतना ही नहीं वे आदेशों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई्र, क्वारनटाइनल और ऐसे लोगोंको आइसोलेशन में भेज देते हैं। इसके बावजूद सिंगापुर में लॉकडाउन लगाया गया क्योंकि अधिकांश नागरिक अपनी सरकार से वायरस को नियंत्रित करने की अपेक्षा करते हैंए न कि फूड डिलीवरी ऐप्स की।ऐसे ही इंडोनेशिया में भी कॉन्टैक्टलैस डिलीवरी नहीं है बल्कि वहां फूड डिलीवरी ऐप्स के शीर्ष पर एक स्लाइडर पर सुरक्षित रहने और कोरोना के प्रसार को रोकने का मैसेज प्रकाशित होता है।

फूड डिलीवरी ऐप्स भी बहुत कुछ बताते हैं कोरोना वायरस के बारे में

जबकि भारत समेत अन्य एशियाई देशों में ज्यादातर फूड ऐप्स सुरक्षा से ज्यादा अपनी सर्विस के फिर से शुरू होने, सीमित डिलीवरी देने और सेवाओं का बखान ही करते नजर आते हैं। बिग बास्केट अपनी रोज की डिलीवरी का ग्राफ अपनी ऐप पर प्रदर्शित करता है। इसी प्रकार कुछ अन्य ऐप्स रियल एस्टेट, इकोनॉमी और देश की राजनीति समेत अन्य बातों के बारे में भी बताते हैं जो यह बताना चाहते हें कि सबकुछ सामान्य है और वे पहले की ही तरह अपना काम कर रहे हैं। यह सब 'न्यू नॉर्मल' को स्थापित करने का उनका एक तरीका है जो सरकारों की सहमति से ही हो रहा है। साथ ही कोरोना महामारी जैसी WORLDWIDE समस्या के दौरान इन ऐप्स की क्षमता को दिखाने का एक तरीका भी है। इसका मतलब यह है कि जब कभी फिर ऐसी स्थिति होगी तो लोग स्वीगी या जोमैटो ऐप डाउनलोड नहीं करेंगे बल्कि वे सीधे बिग बास्केट जैसी ऐप पर जाएंग्रे जो उनकी हर समस्रूा का समाधान कर सकती है फिर जरुरत चाहे कैसी भी क्यों न हो। भारत में बिग बास्केट टॉप 50 ऐप्स में 41वें स्थान पर है। जीमेल से तीन पायदान नीचे और ट्रूकॉलर से तीन पायदान ऊपर। ऐ ग्रोसरी ऐप के लिए यह गर्व की बात है।

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तीन भारतीय युवतियों ने बनाया मिनी रिमोट आइसीयू, कोरोना मरीजों के आ रहा काम

कोरोना वायरस से संक्रमित ऐसे रोगी जिन्हें आइसीयू में रखा गया हो उनकी देखभाल करने के दौरानखुद भी संक्रमित होने का खतरा रहता है। 10 अप्रेल तक दुनिया भर में 208 डॉक्टर और नर्स संक्रमण के कारण दम तोड़ चुके हैं। फ्रंटलाइन में काम कर रहे डॉक्टर्स, नर्स और अन्य मेडिकल स्टाफ को ही संक्रमण का सबसे ज्यादा खतरा होता है। इस समस्या को देखते हुए तीन भारतीय युवतियों ने कोविड-19 कोरोना वायरस रोगियों की निगरानी के लिए एक मिनी रिमोट आइसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) बनाया है। बैंगलुरू में आइओटी सॉल्यूशंस स्टार्टअप चलाने वाली तीन आइटी प्रोफेशनल्स रंजना नायर, सांची पूवया और आराधना कन्नन अंबिली ने क्वारनटाइन में रह रहे रोगियों की निगरानी के लिए एक मिनी आइसीयू यूनिट बनाने की सोची ताकि ऐसे रोगियों की निगरानी सुनिश्चित की जा सके। दरअसल एक सेलिबिंटी नेअपने एक दर्जन कमरे वाले बंगले को रोगियों के क्वारनटाइन फैसिलिटी
के लिए तैयार करवा रहा था।

तीन भारतीय युवतियों ने बनाया मिनी रिमोट आइसीयू, कोरोना मरीजों के आ रहा काम

लेकिन समस्या यह थी कि वह आइसीयू जैसे महंगे उपकरण का वहन नहीं कर सकता था। ऐसे में उसकी मदद की इन तीनों युवतियों ने और एक सस्ता और पोर्टेबल आइसीयू बना दिया। यह एक साथ 100 से अधिक मरीजों पर निगरानी रख सकता है जिसकी मदद से चिकित्सक कभी और कहीं से भी नब्ज, सांस और सेहत की जांच कर सकते हैं। यह मिनी आइसीयू वीडियो के जरिए चिकित्सकों तक मरीज की पल-पल की जानकारी दिखाता है। यह आर्अिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस एक वाई-फाई से चलने वाला उपकरण है जो सटीक श्वसन निगरानी प्रणाली पर आधारित है। यह रोगी से 3 फीट की दूरी से भी रासेगी की सांस की दर को ट्रैक कर सकता है और ऐप को डेटा भेज सकता है।

तीन भारतीय युवतियों ने बनाया मिनी रिमोट आइसीयू, कोरोना मरीजों के आ रहा काम

ऐप इस डेटा का विश्लेषण कर सांस लेने की दर में भारी उतार.चढ़ाव की जानकारी देता है। डॉक्टर इस जानकारी का उपयोग करके यह पता लगा सकते हें कि अब इलाज किस दिशा में किया जाना चाहिए। डिवाइस ऑडियो और वीडियो स्ट्रीमिंग में भी सक्षम है जो गंभीर रूप से बीमार रोगियों की निगरानी के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगा।



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Saturday, April 18, 2020

चीन की स्टार्टअप कंपनी ने बनाया ऐसा थर्मल इमेजिंग गॉगल जो कोरोना संक्रमित व्यक्ति कर लेता है स्कैन

कोरोना वायरस से निपटने में जल्द ही चीन के कुछ खास उपकरणों का उपयोग भी किया जा सकता है। चीनी स्टार्टअप कंपनी रोकिड पिचेज के बनाए एक खास थर्मल इमेजिंग गॉगल की यह खासियत है कि यह कोरोना संक्रमित लोगों को आसानी से स्कैन कर लेता है। चीन के हांग्झो शहर स्थित स्टाटअप के अमरीकी निदेशक लियांग गुआन के अनुसार यह थर्मल ग्लास एक इन्फ्रारेड सेंसर का उपयोग करते हैं जो दो से तीन मीटर के दायरे में मौजूद किसी भी कोरोना संक्रमित या संदिग्ध व्यक्ति को खोज निकालते हैं। इसके सेंसर की क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह दो मिनट के भीतर 200 लोगों के तापमान का पता लगा सकता है। इतना ही इस डिवाइस में क्वालकॉम सीपीयू प्रोसेसर, 12 मेगापिक्सल कैमरा भी लगा हुआ है जो ऑगमेंटेड रियलिटी फीचर्स से भी लैस है। इतना ही हैंड्स-फ्री वॉयस कंट्रोल, लाइव फोटो एवं वीडियो रिकॉर्डिँग की सुविधा भी है। कंपनी इसमें अपडेट संस्करण भी दे रही है जो चेहरा पहचानने के फीचर यानी फेस रिकग्निशन और डेटा प्रबंधन की भी सुविधा देता है।

चीन की स्टार्टअप कंपनी ने बनाया ऐसा थर्मल इमेजिंग गॉगल जो कोरोना संक्रमित व्यक्ति कर लेता है स्कैनचीन की स्टार्टअप कंपनी ने बनाया ऐसा थर्मल इमेजिंग गॉगल जो कोरोना संक्रमित व्यक्ति कर लेता है स्कैन

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जर्मन स्टार्टअप वायरस ट्रेकिंग ऐप बनाने में कर रहे मदद

कोरोनावायरस (COVID 19) से लडऩे के लिए कोरोनावायरस (COVID 19) से लडऩे के लिए यूरोपीय देश अब तक पीछे ही चल रहे हैं। कुछ देशों को छोड़कर ज़्यादातर देशों में हर चीज़ सरकार के भरोसे पर है। ऐसे में जर्मन स्टार्टअप चिकित्सा विभाग और अथॉरिटी की मदद करने के लिए ऐसी ऐप विकसित करने में मदद कर रहे हैं जो आसानी से संक्रमित लोगों को ट्रेस कर सके। जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल के करीबी क्रिस बूस के स्वामित्त्व वाली आरगो कंपनी ऐसी कुछ ऐप्स पर काम कर रही हैं। कंपनी प्राइवेसी फ्रेमवर्क आधारित ऐसी ऐप पर कामकर रही है है जो एकऑप्ट-इन ऐप होगी और किसी संक्रमितव्य्िरतके आसपास के सीमित दायरे में मौजूद अन्य संक्रमित व्यक्ति की पहचान करने में मदद करेगी। आरगो के अलावा एक दर्जन से ज्यादा स्टार्टअप विभाग की मदद करने के लिए ऐसी ही ऐप विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। जर्मनी के अलावा ऑस्ट्रिया और इंग्लैंड भी ऐप आधारित ट्रैकिंग डिवाइस पर काम कर रहे हैं।

जर्मन स्टार्टअप वायरस ट्रेकिंग ऐप बनाने में कर रहे मदद

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Thursday, April 16, 2020

गूगल मैप के लोकेशन डेटा से सामने आया कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक यात्राओं में गिरावट

एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाते हुए हाल ही गूगल ने अपने गूगल मैप के लोकेशन डेटा को जारी किया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि लोग अपने क्षेत्रों में सोशल डिस्टैंसिंग की कितनी पालना कर रहे हैं इस बारे में स्वास्थ्य अधिकारियों को एक वृहद दृष्टि प्रदान कर सकें। इसमें दुनिया भर के देशों के स्थानीय उपयोगकर्ताओं की लोकेशन हिस्ट्री डेटा का उपयोग करते हुए संक्रमितों को चिन्हित कर सके। इसके लिए गूगल ने सार्वजनिक रूप से कोविड-19 वायरस की सामुदायिक गतिशीलता मैप्स की एक श्रृंखला जारी की है। डेटा के आधार पर यह पता किया जा सकता है कि सामाजिक दूरी और घर में रहने के कारण लोगों के व्यवहार में कैसे परिवर्तन आ रहा है।

गूगल मैप के लोकेशन डेटा से सामने आया कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक यात्राओं में गिरावट

131 देशों का डेटा शामिल, 6 श्रेणियों में दिखाती गतिशीलता
गूगल के सामुदायिक गतिशीलता मैप्स की इन रिपोर्टों में अभी 131 देशों को शामिल किया गया है। इसमें दो महीने पुराने डेटा का हाल के डेटा से एक तुलनात्मक निष्कर्ष भी पेश किया गया है। प्रत्येक रिपोर्ट छह श्रेणियों में गतिशीलता के रुझानों को दिखाती है। इनमें रिटेल, मनोरंजन, कैफे, संग्रहालय, किराने, फार्मेसी, सार्वजनिक पार्क और राष्ट्रीय उद्यान सहित ट्रांजिट स्टेशन, कार्यस्थल और आवासीय गतिशीलता शामिल हैं। इतना ही नहीं प्रत्येक देश की रिपोर्ट को अलग-अलग राज्यों या प्रांतों का विवरण भी देती है। इसमें वर्तमान में कोरोना वायरस संक्रमितों का गढ़ बन चुका अमरीका की रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है।

गूगल मैप के लोकेशन डेटा से सामने आया कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक यात्राओं में गिरावट

इसलिए महत्त्वपूर्ण है ये डेटा
गूगल के इस मैप डेटा को रिलीज़ करने, इसकी व्याख्या करने मैप्स के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जेन फिट्ज़पैट्रिक और गूगल के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी करेन डेसाल्वो का कहना है कि यह जानकारी 131 देशों में वहां के सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को स्थानीय स्तर पर सोशल डिस्टैंसिंग के उपायों की प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए, यह जानकारी अधिकारियों को किसी विशेष क्षेत्र में यात्राओं में हुए परिवर्तन को समझने में मदद कर सकती है। साथ ही व्यावसायिक समयावधि में परिवहन, चिकित्सा, शारीरिक दूरी और social distancing के लिए लोगों को सचेत करने में मदद कर सकती है। इसी तरह काम से या अन्य कारणों से बाहर निकले लागों के कफ्यू या लॉकडाउन की स्थितिमें अतिरिक्त परिवहन साधनों की व्यवस्था कर उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं। साथ ही अधिकारियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य और समुदायों की आवश्यक जरूरतों को पूरा करने में भी मदद कर सकता है। हालांकि गूगल ने यह भी कहा कि यह केवल उन्हीं लोगों का डेटा है जिन्होंने अपनी लोकेशन हिस्ट्री को चालू किया हुआ है। यह एक ऑप्ट-इन सेटिंग होती है जो डिफॉल्ट रूप से बंद है।

गूगल मैप के लोकेशन डेटा से सामने आया कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक यात्राओं में गिरावट

डेटा पर एक नजर
-94 फीसदी गिरावट आई है इटली में रिटेल शॉपिंग और मनोरंजन के स्थानों पर लोगों की आवाजाही में
-87 फीसदी की गिरावट है रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप और टैक्सी स्टैंड पर लोगों के आने-जाने में यहां
-24 फीसदी की ही गिरावट देखी जा रही है रिटेल शॉपिंग और मनोरंजन स्थलों पर स्वीडन में क्योंकि यहां कोविड-19 के
मामले कम हैं।
-43 फीसदी की वृद्धि हुई है इस बीच स्वीडन में पार्क घूमने वालों की संख्या में

गूगल मैप के लोकेशन डेटा से सामने आया कोरोना वायरस के चलते सार्वजनिक यात्राओं में गिरावट

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डिजिटल मैपिंग से हटेगा यूरोप में कोरोना का लॉकडाउन

यूरोपीय आयोग ने क्षेत्रीय कोरोनावायरस प्रतिबंधों को उठाने के समन्वय के लिए एक योजना बनाई है जिसमें यूरोपीय संघ के कार्यकारी रिपोर्टिंग और संपर्क ट्रेसिंग की एक मजबूत प्रणाली के रूप में डिजिटल उपकरण की भूमिका भी शामिल है। पिछले हफ्ते आयोग ने कोरोनवायरस से लडऩे के लिए डेटा और ऐप्स के लिए तकनीकी उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। आयोग ने दिशा निर्देशों, मानदंडों और उपायों की एक सूची तैयार की है। ईसी की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने पूरे रोडमैप के बारे में बताया। व्यापक रोडमैप में शामिल अन्य उपायों में राज्यों को अपनी कोरोनोवायरस परीक्षण क्षमता का विस्तार करने और ट्रेसिंग पद्धति को सक्षम और सटीक बनाने के लिए डिजिटल मैपिंग तैयार करने के लिए जोर दिया गया है। इसके लिए वे मोबाइल एप्लिकेशन भी विकसित कर रहे हैं जो सकारात्मक परीक्षण किए गए व्यक्ति के संपर्क में आने के तुरंत बाद नागरिकों को अधिक जोखिम की चेतावनी देते हैं, विशेष रूप से रोकथाम के लिए सावधान करते हैं।

डिजिटल मैपिंग से हटेगा यूरोप में कोरोना का लॉकडाउन

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माइक्रोसॉफ्ट के इस क्लाउड-आधारित मॉनिटरिंग टूल से बिना संक्रमित हुए कर सकेंगे कोरोना मरीजों की देखभाल

जीई और माइक्रोसॉफ्ट मिलकर एक क्लाउड-आधारित मॉनिटरिंग टूल विकसित किया है। यह कोरोना वायरस से संक्रमित रोगी के लिए काफी उपयोगी है। यह निगरानी सॉफ्टवेयर जीई हेल्थकेयर के सूचना और प्रबंधन प्रणाली विभाग ने अपने म्यूरल वर्चुअल केयर सॉल्यूशन की मदद से बनाया है। जनवरी 2021 तक यह आम रोगियों के काम आने लगेगा। इस सॉफ्टवेयर को एक केंद्रीय हब प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है जहां से अस्पताल के कर्मचारी गहन चिकित्सा इकाइयों में रोगियों की निगरानी कर सकते हैं। जिनमें चिकित्सा वेंटिलेशन भी शामिल है। माइक्रोसॉफ्ट के मुख्य वैश्विक चिकित्सा अधिकारी डॉ. डेविड रोव ने कहा कि दूरस्थ निगरानी उपकरण अस्पताल के कर्मचारियों को संक्रमित रोगियों के संपर्क में आने से बचाएगी। यह एक मॉनिटरिंग टूल केवल तीन वरिष्ठ नर्सों और दो गहन चिकित्सा कक्ष कर्मी के साथ 100 बेड वाले आईसीयू नेटवर्क की निगरानी कर सकता है। यह सॉफ्टवेयर वेंटिलेटर मौजूदा रोगी निगरानी प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड, लैब और अन्य डायग्नोस्टिक्स से रीयल-टाइम डेटा एकत्र करता है।



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ऐसा वायरलैस बॉक्स जो संक्रमित व्यक्ति की सांस और गतिविधियों की करता है निगरानी

आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस के संक्रमण की गिरफ्त हमें है और इसका सबसे ज़्यादा खतरा फ्रोंटलीने में काम कर रहे चिकित्सा कर्मियो और उनके परिजनों को है। कोरोना वायरस की महामारी ने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती पेश की है। सोशल डिस्टैंसिंग इस समय एकमात्र उपचार है। ऐसे में एमआइटी के कुछ शोधार्थियों ने घर के लिए एक ऐसा उपकरण बनाया है जो घर में आए किसी भी संक्रमित व्यक्ति की सांस और गतिविधियों को बारीकी से पहचानकर ऑप्ट-इन-सिस्टम के तहत हमें सचेत कर सकता है। यह देखने में किसी वाई-फाई राउटर जैसा नजर आता है। यह विभिन्न गतिविधियों का पता लगाने के लिए वायरलेस सिग्नल का उपयोग करता है जिसमें मरीज की हरकतों, नींद के पैटर्न और यहां तक कि सांस लेना भी शामिल है। एमरल्ड नाम का यह गैजेट अलग-अलग लोगों को ट्रैक करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर अंतर करने में भी सक्षम है। फिलहाल इसका बॉस्टन में परीक्षण चल रहा है।



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Tuesday, April 14, 2020

बोलने वाले एआइ रोबोट को कोविड-19 के लिए लोगों की मदद करने का समाधान माना जा रहा है

कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले रोबोट भी काम पर
लोगों को अपडेट रखने और कोरोना वायरस के बारे में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस गुण को पहचानते हुए कुछ संगठन बातचीत करने वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले स्मार्ट रोबोट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैश्विक संगठनों को उम्मीद कर रहा है कि वे इस प्रौद्योगिकी का उपयोग करके लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही में सुधार कर सकते हैं। दरअसल लोगों तक सही और सटीक जानकारी देने केलिए पारंपरिक मीडिया, वेब, एसएमएस या ईमेल के माध्यम से फैल रही कोरोना संबंधी भ्रांतियों को रोकना भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। द नेक्स्ट वेब संस्था का कहना है कि कोविड-19 के बारेमें जानकारी लेने के लिए आपातकालीन कॉलसेंटर्स पर लगातार फोन कॉल आते रहते हैं जिन्हें ऑपरेटर्स के लिए संभालना मुश्किल है।

बोलने वाले एआइ रोबोट को कोविड-19 के लिए लोगों की मदद करने का समाधान माना जा रहा है

इसलिए इन मुट््रठीभर सरकारी स्वास्थ्य संगठनों ने अब एआई का रुख किया है। ये एआई व्यक्तिगत जुड़ाव भी देते हैं। इससे घर से काम कर रहे या स्वास्थ्य कारणों से अनुपस्थित कर्मचारियों की कमी को पूरा कर इन कॉल सेंटरों को अपनी पूर्ण क्षमता पर काम करने में मदद करता है। इससे 300 कर्मचारियों की जगह ५० कर्मचारियों से भी काम चलाया जा सकता है। इतना ही नहीं इन रोबोट्स को फ्रंटलाइन में काम करने के लिए इन वर्चुअल असिस्टेंट को भी नियुत किया जा सकता है। एआई एक संवादात्मक तंत्र प्रदान करता है जो सभी को यह जानकारी दे सकता है कि सरकारें महामारी को कैसे संभाल रहे हैं।

बोलने वाले एआइ रोबोट को कोविड-19 के लिए लोगों की मदद करने का समाधान माना जा रहा है

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2018 में 7 फीसदी ऑनलाइन शॉपिग करने वाले जापान में आज 39 फीसदी बढ़ी

ऐसे में आमतौर पर ई-कॉमर्स से दूर रहने वाले जापान में ऑनलाइन शॉपिंग अपनाने के अलावा कोई बहाना नहीं हो सकता है। प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने इस सप्ताह के शुरू में टोक्यो और छह अन्य क्षेत्रों के लिए आपातकाल की स्थिति घोषित की। इस दौरान जरूरी दुकानों को छोड़कर अन्य सेवाएं बंद रहेंगी। अमरीका, चीन और भारत की तुलना में जापान में ई-कॉमर्स बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं है। यहां 2018 में केवल 7 फीसदी लोग ही ऑनलाइन शॉपिंग करते थे। नोमुरा रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक शोधकर्ता ताकेशी मोरी का कहना है कि आपातकालीन स्थितियों के दौरान ई-कॉमर्स के उपयोगकर्ताओंमें उछाल आया है। मोरी का अनुमान है कि वायरस के प्रकोप के शांत होने के बाद जापान में ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले लोगों में और वृद्धि हो सकती है।

2018 में 7 फीसदी ऑनलाइन शॉपिग करने वाले जापान में आज 39 फीसदी बढ़ी

जापान सरकार भी बीते कुछ सालों से देश में कैशलेस भुगतान को बढ़ावा दे रही है और नई खुदरा प्रौद्योगिकी को अपनाने के लिए व्यवसायों को प्रोत्साहित कर रही है। जापान की वेब खरीदारी की दर अमरीका के मुकाबले बहुत अच्छी है और प्रत्येक पांचवे ऑनलाइन शॉपर वाले चीन की तुलना में कहीं अधिक है। जापानी अब इसे एक आवश्यकता मान रहे हैं। जापानी ई-कॉमर्स कंपनी राकुटेन इंक ने कहा कि हाल के महीनों में ऑनलाइन मार्केटप्लेस की बिग्री एक साल पहले की तुलना में अधिक है।

2018 में 7 फीसदी ऑनलाइन शॉपिग करने वाले जापान में आज 39 फीसदी बढ़ी

मार्च में शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया कि 20 से 60 साल की उम्र के केवल 10 फीसदी लोगों ने ऑनलाइन खरीदारी की। अप्रैल में यह संख्या बढ़कर 39 फीसदी तक बढ़ गया। गूगल के एक मोबिलिटी सेर्वमें सामने आया कि पिछले महीने टोक्यो में खरीदारी करने के लिए घर से निकलने वालों की संख्श 63 फीसदी गिर गया। मार्च में हुए सर्वे में यह अटकलें भी लगाई गईं हैं कि करीब 12 फीसदी लोग नकद लेन देन को लेकर अब भी चिंतित हैं।

2018 में 7 फीसदी ऑनलाइन शॉपिग करने वाले जापान में आज 39 फीसदी बढ़ी

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यहां ऑटोनोमस शटल से कलेक्ट कर रहे सैंपल

कोरोना वायरस अब दुनिया के अधिकांश देशों में फैल चुका है।कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित देश अमरीका के शहर फ्लोरिडा में स्थित मेयो क्लिनिक ने वायरस संक्रमण के दौरान भी लोगोंसे संपर्क साधने का एक मशीनी तरीका खोज लिया है। दरअसल मेयो क्लिनिक ने अपनी ऑटोनोमस शटल को चलते-फिरते परीक्षण लैब में बदल दिया है। चिकित्सा परीक्षण के लिए CLINIC इस ऑटोनॉमस शटल का उपयोग कर कोविड-19 के SAMPLE कलेक्शन के लिए घर जाकर नमूने एकत्र कर रही है। मेयो क्लिनिक इसे ड्राइव-थ्रू टेस्टिंग चेकपॉइंट कह रही है। शटल में एक भी मानव कर्मचारी नहीं है।
मेयो क्लिनिक ने इस परियोजना के लिए जैक्सनविले ट्रांसपोर्टेशन अथॉरिटी, सेल्फ.ड्राइविंग स्टार्टअप बीप और नायवा के साथ मिलकर काम किया है। 30 मार्च को चार ऑटोनोमस शटल ने यह सेवा शुरू की।

यहां ऑटोनोमस शटल से कलेक्ट कर रहे सैंपल

एक बार परीक्षण पूरा हो जाने के बादए कार्यकर्ता नमूनों को एक सुरक्षित कंटेनर में लोड करते हैं और उन्हें शटल में रख देते हैं जो तब एक विशेष रूट से रास्ता तय करते हुए CLINIC पहुंचती है। SHUTTLE को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक केंद्रीय कमांड सेंटर से शटल की निगरानी भी की जाती है। फ्लोरिडा में मेयो क्लिनिक परिसर के चारों ओर COVID-19 परीक्षण नमूनों को लाने-ले जाने के लिए ऑटोनोमस शटल्स का उपयोग किया जा रहा है मेयो क्लिनिक के सीईओ केंट थिएलेन ने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके हम कर्मचारियों को अत्याधुनिक स्वायत्त वाहन प्रौद्योगिकी के उपयोग से इस संक्रामक वायरस के संपर्क से बचा सकते हैं और स्टाफ को भी समय एवं वायरस से सुरक्षित रख सकते हैं।



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Monday, April 13, 2020

कोरोना संक्रमण के चलते जापान में छात्रों की जगह रोबोट्स ले रहे डिग्रियां

सोशल डिस्टैंसिंग को बनाए रखने के लिए शैक्षणिक संस्थान अवतार रोबोट्स और बड़े टैबलेट्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे ही अवतार रोबोट्स का इस्तेमाल बीते दिनों जापान में देखने को मिला। दरअसल, टोक्यो विश्वविद्यालय में हाल ही गे्रजुएशन सेरेमनी (दीक्षांत समारोह) का आयोजन किया। लेकिन कोरोना वायसरस की दूसरी लहर का सामना कर रहे जापान में सोयाल डिस्टैंसिंग और संक्रमण को दूर रखने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अवतार रोबोट्स का इस्तेमाल कर छात्रों ने सार्वजनिक रूप से अपने प्रमाण पत्र प्राप्त किए। इस तरह अपने घर पर रहते हुए संस्थान के दीक्षांत समारोह में प्रमाण पत्र पाने का यह संभवत: अपनी तरह का पहला मामला है।

कोरोना संक्रमण के चलते जापान में छात्रों की जगह रोबोट्स ले रहे डिग्रियां

कोरोना वायरस के चलते जापान में गर्मियों में आयोजित होने वाली सभी गे्रजुएशन सेरेमनी को स्थगित कर दिया गया है। इसलिए एएनए रोबोट निर्माता कंपनी ने 'न्यू मी' नाम के अवतार रोबोट तैयार किए जो छात्रों की जगह समारोह में participate कर सकें। ये सभी रोबोट्स ग्रेजुएशन पोशाक में समारोह में पहुंचे थे। इन रोबोट्स के चेहरे की जगह बड़े टैबलेट्स थे जिन पर स्नातक हो चुके छात्र रोबोट्स को लाइव अपना-अपना प्रमाण पत्र लेते हुए देख सकते थे। इन छात्रों ने अपने घर से ही इन रोबोट्स मेंलॉग-इन किया था और उसे अपने लैपटॉप से नियंत्रित भी कर रहे थे। एक के बाद एक अवतार रोबोट्स प्रमाण पत्र लेने के लिए पोडियम के पास आते और सर्टिफिकेट लेकर आगे बढ़ जाते। इतना ही छात्रों ने अपना ग्रेजुएशनसेरेमनी संदेश भी इन रोबोट्स के माध्यम से विश्वविद्यालय स्टाफ तक पहुंचाया। टोक्यो विश्वविद्यालय को उम्मीद है कि इस प्रयोग को अन्य शैक्षणिक संस्थाएं भी अपनाएंगी।

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15 साल के छात्र ने अपने शयनकक्ष को बनायश पीपीई फैक्ट्री, ३डी प्रिंटर से बना रहा फेस शील्ड

खेल, कार, हार्डवेयर बनाने वाली नामी कंपनियां भी अब अपने मूल उत्पादन को बंदकर मासक, वेंटिलेटर और फेस शील्ड बना रही हैं। इसी से प्रेरित होकर एक 15 साल के किशोर छात्र ने भी अपने शयनकक्ष को पूरी तरह से पीपीई फैक्ट्री में बदल दिया है। वह यहां चिकित्साकर्मियों के लिए कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए ३डी प्रिंटर की मदद से फेस शील्ड बना रहा है। यह ३डी प्रिंटर उनके माता-पिता ने उन्हें चिकित्सा उपकरण डिजायन करने के लिए जन्मदिन पर तोहफे में दिया था।

15 साल के छात्र ने अपने शयनकक्ष को बनायश पीपीई फैक्ट्री, ३डी प्रिंटर से बना रहा फेस शील्ड

सभी के लिए मुफ्त में पीपीई
इंग्लैंड के मिडिलबोरो के रहने वाले स्कूली छात्र हैरी कूपर ने निजी सुरक्षा उपकरण यानी पीपीई बनाने के लिए अपने कमरे को उत्पादन यूनिट में बदल दिया है। उनका कहना हैकि वे इन सुरक्षा उपकरणों को स्वास्थ्यकर्मियों को मुफ्त में सौंपेंगे। वह अपनी 3 डी प्रिंटिंग सामग्री के लिए ऑनलाइन फंडरेजिंग पेज के जरिए लोगों से आर्थिक सहायता करने को कह रहा है ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में फेस शील्ड बनाए जा सकें। कूपर का लक्ष्य उन लोगों के लिए चेहरे की ढाल का उत्पादन करना है जिन्हें व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की सख्त जरूरत है। उनके पास अभी दुकान के मालिकों, दंत चिकित्सक सहायकों, सामुदायिक कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य सहायकों से कम से कम 100 ऑर्डर मिल चुके हैं।

15 साल के छात्र ने अपने शयनकक्ष को बनायश पीपीई फैक्ट्री, ३डी प्रिंटर से बना रहा फेस शील्ड

चिकित्सा उपकरणों की कमी को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने नागरिकों से घोषणा की है कि फेस शील्ड, पॉली कार्बोनेट से बने सुरक्षा चश्मे, टोपी, सर्जिकल ग्लव्ज, मास्क या ऐसा कोई सामान जो चिकित्साकर्मियों की मदद कर सके, वे जरुरतमंदों तक पहुंचाएं। अकेले कूपर ही ऐसानहीं कर रहे हैं। डबलिन में 32 वर्षीय कंप्यूटर गेम कंपनी के कर्मचारी डैनियल मूनी भी फेस शील्ड उपकरण बनाने के लिए अपने 3 डी प्रिंटर का उपयोग कर रहे हैं। उनकी टीम प्रत्येक दिन कम से कम 75 फेस शील्ड बना सकती है।

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