हाल ही डिजायनर जून केमी ने ऐसा ही एक डिजायन तैयार किया है। जून को शुरू से ही प्राकृतिक जीव-जंतुओं के अंगों के डिजायन आकर्षित करते रहे हैं। उन्होंने प्रकृति की इंजीनियरिंग से प्रभावित होकर जून ने 'एम्फीबियो' नामक एक थ्रीडी प्रिन्टेड उपकरण बनाया है जो पानी में कृत्रिम गिल्स (गलफड़ों) की तरह इंसानों को सांस लेने में मदद कर सकता है। लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट की स्नातक जून ने अ ारसीए-आइआइएस टोक्यो डिजायन लैब के साथ मिलकर पानी के अंदर कृत्रिम श्वसन तंत्र उपकरण विकसित किया है। जून का कहना है कि जिस तेजी से ग्लेशियर के पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, आने वाले समय में इंसानों के लिए पानी के भीतर कृत्रिम रूप से सांस लेने की तकनीक का होना बहुत जरूरी है। इसी समस्या से प्रभावित होकर उन्हें 'एम्फीबियो' बनाने का विचार आया। भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग के चलते शहर खासकर समुद्र किनारे बसे शहरों में पर्यावरण बिल्कुल बदल जाएगा।
कैसे काम करता है 'एम्फीबियो'
पानी के भीतर सांस लेने वाले जलचरों के गिल्स से प्रेरित होकर एम्फीबियो अंत: वस्त्र और मास्क के दो हिस्सों वाला एक थ्रीडी मुद्रित कपड़े जैसा उपकरण है। यह मास्क एक 'सुपरहाइड्रोफोबिक' (प्रतिरोधक) सामग्री से बना मास्क है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक प्रकार झीना कपड़ा है जो आस-पास के पानी से ऑक्सीजन सोखता है और कार्बनडाइआसॅक्साइड को नष्ट करता है। फिलहाल इसका प्रोटाटाइप तैयार कर लिया गया है और इस पर लैब में बने इक्वेरियम में परीक्षण किया जा रहा है। टीम का अगला कदम यह सुनिश्चित करना है कि इंसान इसे पहनकर व्यवहारिक रूप से पानी के भीतर सांस ले सकें।
अभी समय लगेगा इस तकनीक को
हालांकि जून का मानना है कि इसमें अभी समय लगेगा। इंसानी शरीर को पानी के भीतर पर्याप्त ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए इस गिल को 344 वर्ग फ़ीट जितने पानी की जरुरत होगी। जून का कहना है कि इंसान की ऑक्सीजन की खपत बढ़ती जा रही है और पर्यावरण में कार्बडाइऑक्साइड की मात्रा भी तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारे पास पानी में मौजूद ऑक्सीजन का भंडार भी है लेकिन इसके लिए पर्याप्त तकनीक नहीं है।

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